मानसिक रोगो का अंतरास्ट्रीय वर्गीकरण ICD 10

WHO ने १९९२ में ICD 10 का प्रकाशन किया समस्त मानसिक विकारो को इसमें कई खंडो में रखा गया है इस वर्गीकरण में लक्षणों के आधार पर १० प्रमिख वर्गों का प्रयोग किया गया है |

  1. आंगिक लक्षणयुक्त मानसिक विकार -इसमें ऐसे  मानसिक विकारो को रखा गया है जो मस्तिष्कीय रोगो अथवा मस्तिष्कीय आघातों  द्वारा उत्पन्न होते है  इसमें अनेक मनोवृति होती है परन्तु उनका वर्गीकरण मुख्या दो वर्गों में किया जा सकता है प्रथम समूह संज्ञानात्मक प्रकार्यो जैसे स्मृति, बुद्धि, अधिगम ,सवेंदना प्रत्यक्षीकरण से सम्बिन्धित मानसिक विकारो को सम्मलित किया गया है जबकि दुतिय समूह में व्यक्ति की अभिव्यक्तियों भावो अनुभवों विचारो ,भावनाओ एवं व्यक्तिव में उत्पन्न विकारो को सम्मलित किया गया है इसमें  को बालयवस्था में ही नहीं किसी भी अवस्था में पाया जा सकता है | 
  2. मनोसक्रिय पदार्थो के कारण उत्पन्न मानसिक एवं व्यवहार परक विकार- इसमें ऐसे विकारो को सम्मलित किया गया है जिसकी उत्पत्ति मादक पदार्थो जैसे शराब , चरस ,गांजा ,भांग, हेरोइन ,तम्बाकू ,आदि के सेवन से उतपन्न होती है इन मादक पदार्थो के उपयोग से रोगी में मानसिक है तथा मनोविदलता के लक्षण उत्पन्न होते है इसमें मनोविक्षिप्ति,मनोभ्रंशाता आदि मनो विकारो को रखा गया है | 
  3. मनोविदलता,मनोविदलतासम एवं व्यामोहित विकार -इस वर्ग में मनोविदलता को प्रमुखता दी गई है जिसके प्रमुख लक्षण व्यामोह एवं विभ्रम है परन्तु कुछ ऐसे विकार है जिसमे व्यामोह के लक्षण तो नहीं पाए जाते है लेकिन मनोविदलता के लक्षण पाए जाते है उन्हें भी समानता के आधार पर इसी वर्ग में रखा गया है |
  4. मनोदशाजन्य (भावात्मक) विकार -इसमें ऐसे विकारो को सम्मलित किया गया है जो मनो दशाओ में परिवर्तन कारण उत्पन्न होते है जब रोगी में अवसाद अथवा उल्लास की अवस्था पायी जाती है तब इन विकारो की उत्पत्ति होती है क्योकि जब रोगी की मनो दशा परिवर्तित होगी तब उसमे शारीरिक परिवर्तन भी घटित होंगे यह मानसिक विकार सभी आयु के व्यक्तियों में पाया जाता है | 
  5. मनस्तापी ,प्रतिबल संबंधी एवं दैहिक विकार - इसके अंतरगत व्यापक मानसिक विकारो  को रखा गया है जिनका सम्बन्ध मनस्ताप के अभिग्रहो से है इस वर्ग से संबंधित मनोविकार मनो जन्य होते है परन्तु इनकी अभिव्यक्ति शारीरिक विकारो के रूप में होती है | 
  6. शारीरिक एवं भौतिक कारणों  से उत्पन्न व्याहारिक संलक्षण -इस वर्ग में ऐसे मनोविकारो को सम्मलित  किया गया है    जिनके  सलक्षण भोजन क्रिया संबंधित विकार ,निद्रा विकार , रति विकार आदि | इन विकारो से सामान्य क्रिया कलाप में अवरोध उत्पन्न  होता है | 
  7. वयस्क व्यक्तित्व एवं व्यवहार सम्बन्धी विकार -इसके अंतरगत उन विकारो को रखा गया है जो व्यक्ति के विशिष्ट जीवन शैली तथा विशिष्ट व्यवहार पद्धति से सम्बंधित होता है यह अपेक्षाकृत स्थाई होता है | 
  8. बौद्धिक मंदता - इस वर्ग में बौद्धिक क्षीणता को एक मानसिक विकार मानकर रखा गया है क्योकि मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाने पर व्यक्ति में सामान्य व्यक्तिओ की तुलना में तीन गुना अधिक मानसिक विकार के पाए जाने की संभावना रहती है ऐसे मानसिक रोगी नवीन तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में उपर्युक्त वयवहार प्रदर्शित कर पते है और न ही दूसरे व्यक्ति द्वारा शारीरिक और यौन शोषण होने पर अपनी सुरक्षा कर पाते है व्यक्ति में पायी जाने वाली बौद्धिक मन्दताके अनेक स्तर जैसे मूर्खता , मूढ़ता , एवं जड़ता आदि है | 
  9. मनोवैज्ञानिक विकास के विकार -इसमें ऐसे मानसिक विकारो को रखा गया है जिनका विकाश शैशवावस्था में प्रारम्भ हो जाता है या बालयवस्था में इन मानसिक विकारो में भाषा संबंधित दोष दृस्टि संबंधी दोष तथा गति सम्बन्धी क्रियाओ में उत्पन्न दोषो को सम्मलित किया जाता है | 
  10. बालयवस्था एवं किशोरावस्था के व्याहारिक एवं संवेगात्मक विकास - इसमें बल्यावस्था और किशोरावस्था में दिखाई देने वाले व्यवहार परक एवं सावेंगिक /भावात्मक विकारो को रखा गया  है |       






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